छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शुक्रवार को 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधीया को 39 साल पुराने एक रिश्वत मामले में बरी कर दिया। यह फैसला उस सज़ा को पलटता है जो 2004 में निचली अदालत ने सुनाई थी। अवधीया पर आरोप था कि उन्होंने वर्ष 1986 में रायपुर में बिल असिस्टेंट के पद पर रहते हुए ₹100 की रिश्वत माँगी थी।

अदालत ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। न तो रिश्वत की राशि बरामद हुई और न ही कोई गवाह इस आरोप की पुष्टि कर सका। इस मामले में करीब चार दशक तक 100 से अधिक बार सुनवाई हुई।

लंबी अदालती लड़ाई ने अवधीया का जीवन बदल दिया। उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा, बचत खत्म हो गई, पत्नी तनाव के कारण चल बसीं और बेटों की पढ़ाई भी बीच में रुक गई। यह मामला भारत की न्याय व्यवस्था में लंबित पड़े 50 मिलियन से अधिक मामलों की गंभीर समस्या को भी उजागर करता है।

चार दशक लंबी न्याय की लड़ाई

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहने वाले जागेश्वर सिंह पर 1986 में आरोप लगाया गया कि उन्होंने ₹100 की रिश्वत मांगी। उस समय वे ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन में बिल असिस्टेंट के पद पर ईमानदारी से नौकरी कर रहे थे। आरोप इतना छोटा था कि किसी को यकीन नहीं हुआ कि यह सच हो सकता है, लेकिन इसी झूठे आरोप ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

निचली अदालत ने 2004 में उन्हें दोषी ठहराया और जेल भेज दिया। वे लगभग 39 साल तक जेल और अदालतों के चक्कर काटते रहे। 19 सितंबर 2025 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आखिरकार यह कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि न तो रिश्वत की रकम बरामद हुई और न ही कोई गवाह आरोपों को साबित कर पाया।

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टूटा परिवार, छूटा भविष्य

जागेश्वर सिंह की इस लंबी लड़ाई ने न केवल उनकी जिंदगी छीन ली बल्कि पूरे परिवार को तबाह कर दिया।

  • पत्नी का निधन: लगातार अदालतों के चक्कर और मानसिक तनाव ने उनकी पत्नी की जान ले ली।
  • बच्चों की पढ़ाई छूटी: फीस न भर पाने की वजह से बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया। उनका भविष्य अंधकारमय हो गया।
  • इज्जत पर दाग: समाज ने उनके पूरे परिवार को रिश्वतखोर का तमगा दे दिया।
  • आर्थिक तबाही: सारी जमा-पूंजी वकीलों और केस पर खर्च हो गई।

एक पिता ने अपने बेटे की पढ़ाई सिर्फ ₹500 की कमी के कारण रुकते देखी। समाज में बेइज्जती झेली और अंततः अपने परिवार को बिखरते देखा।

न्यायपालिका पर उठे सवाल

इस फैसले ने एक बार फिर भारत की न्यायपालिका में लंबित मामलों की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्तमान में देश में 5 करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों से न केवल पीड़ित पक्ष का जीवन प्रभावित होता है बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता भी कमज़ोर पड़ती है।

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फैसला और उम्मीद

हाईकोर्ट ने अवधीया को आरोपों से पूरी तरह मुक्त करते हुए कहा कि केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि ठोस सबूत और विश्वसनीय गवाही के बिना सज़ा देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

अवधीया के वकीलों का कहना है कि यह फैसला भले ही देर से आया हो, लेकिन इसने उनके मुवक्किल को वह सम्मान वापस दिलाया जिसका इंतज़ार उन्हें लगभग चार दशक तक करना पड़ा।